Friday, June 11, 2010

प्यासा कौवा

एक शहर की बात है, शहर कौन सा है ये आप ही तय कीजिये। वैसे देखा जाए तो इस बात का इस कहानी पे कोई भी असर नहीं पड़ता है की शहर कहाँ और कौन सा है। बस यूं समझ लीजिये की कोई भी शहर हो, कहानी हमारी इतनी फ्लेक्सिबल है की हर जगह फिट हो ही जाती है। अपनी कल्पना की सरलता के लिए अपने शहर का ही सन्दर्भ चुन सकते हैं.

तो बात है एक शहर की। वहाँ पर कुछ कौवों का एक ग्रुप था। वो अपने आप को किलर क्रोज़ के नाम से बुलाते थे। सार कौवे आपस में बेस्ट फ्रेंड थे। उनमे से एक कौवा था जो "चतुर कौवे" के खानदान से था। चतुर कौवा? अब आप सोच रहे होंगे की ये चतुर कौवा कौन है भाई ? मेरा अज़म्प्शन है की चतुर कौवे को तो आप सब जानते ही होंगे। अरे वही चतुर कौवा जिसने घड़े में कंकण डालके अपनी प्यास बुझाई थी ।

इस कौवे का नाम वैसे तो कुछ और था लेकिन ये अपने आप को "कूल क्रो" कहलाना पसंद करता था। बाकी कौवे वैसे तो हमेशा इसके साथ ही कभी किसी पेड़ पे या बिजली के तार पे हँग आउट किया करते थे लेकिन पीठ पीछे इससे थोड़ा जलते थे। कारण ये था की कूल क्रो जब देखो अपने चतुर कौवे के खानदान का होने की धौंस जमाता रहता था।

एक दिन बाकी कौवों ने सोचा की इसको अच्छा मज़ा चखाते हैं। उन्होंने कहा की चलो हम रेस लगाते हैं । और जो जीतेगा बाकी सब कौवे उसे अपना लीडर मानेंगे और हमेशा उसकी जी-हुजूरी करेंगे । तय ये हुआ के आने वाले सन्डे को सब लोग शहर में जो नया मल्टीप्लेक्स खुला है उसकी छत पे मिलेंगे और वहाँ से नॉन स्टॉप उड़ेंगे शहर के दूसरे छोर पे जो बड़ा सा हनुमान मंदिर है वहाँ तक। जो भी बीच में रुका वो ऐसे ही डिसक्वालीफाई हो जाएगा।

बाकी कौवों ने क्या किया कि एक दिन पहले ही मंदिर जाकर वहाँ के आसपास के सारे छोटे मोटे कंकण पत्थर सब दूर फ़ेंक दिए । वहाँ पर एक पुराना घड़ा था जिसमे बरसात के कारण थोड़ा पानी जमा हो गया था । प्लान ये था कूल क्रो जब रेस जीतने के लिए आगे-आगे उड़ेगा तो हम सब उसके पीछे-पीछे आराम से धीरे-धीरे गंतव्य पर पहुचेंगे। और क्योंकि कूल क्रो सबसे तेज उड़कर वहाँ पहुचेगा, वो बेतहासा थका हुआ और प्यासा होगा । वहाँ पानी ऊपर लाने के लिएवो जैसे ही कंकण ढूँढने कि कोशिश करेगा हम सब वहाँ पहुच कर उसकी वो बेइज्जती करेंगे कि सारी "कूल-क्रो-गिरी" धरी कि धरी रह जायेगी।

जैसे जैसे दिन बीते, जहां एक और कूल क्रो ने दिन रात एक कर दिया कॉम्पटीशन कि तैय्यारी के लिए, बाकी कौवे मजे से टाइम पास करते रहे। उनमे से एक कौवा जो कूल क्रो के लिए हमदर्दी रखता था वो थोड़ा गिल्टी फील करने लगा और आखिरकार कॉम्पटीशन के पहले वाली रात को कूल क्रो से मिला और सारा प्लान उसे बता दिया। उसने कहा कि कल सुबह सूरज कि पहली किरण के साथ रेस शुरू हो जायेगी और रेस ख़त्म होते होते तुम्हे हमारे ग्रुप से निकाल दिया जाएगा । भलाई इसी में है कि आज रात ही इस शहर से कहीं दूर चले जाओ या फिर बाकी कौवों के पास जाकर हार मान लो। एक तो रात का अँधेरा दूसरे हमारे पास अब समय भी इतना कम है कि हम चाहें तो भी कंकण इकट्ठे नहीं कर सकते। और अगर कोशिश की भी जाए तो मंदिर इतना दूर है की हम सुबह से पहले वापस नहीं आ सकते।

कूल क्रो ने कहा की मैं तुम्हारा अहसान मानता हूँ की तुमने मेरी मदद करने की कोशिश की। तुम्हारी बात सही है अब हम चाहें तो भी कुछ नहीं कर सकते। लेकिन मैं अब रेस में भाग लेने से मना नहीं कर सकता । मैं चतुर कौवे के खानदान का हूँ और अब ये मेरे खानदान की इज्ज़त का सवाल है । जो होगा देखा जाएगा।

अगली सुबह रेस शुरू हुई और जैसा कि प्लान था चतुर कौवा आगे आगे भागा और मंदिर पहुचते-पहुचते थक कर चूर हो गया। वहाँ पहुच कर क्या देखता है की पूरे शहर के कौवे पहले से ही मौजूद थे । इसका मतलब था कि बाकी कूल क्रोज़ ने उसको सिर्फ ग्रुप से निकालने का ही नहीं बल्कि उसके खानदान को पूरे कौवा बिरादरी में बदनाम करने का षड़यंत्र रच रखा था। उसके वहाँ पहुचते ही सबने चिल्लाना शुरू किया कूल क्रो अब क्या करोगे ? कंकण तो है नहीं प्यास कैसे बुझाओगे? तुम्हारे चतुर परदादा ने और कोई चतुराई नहीं सिखाई तुम्हे पानी पीने के लिए? और भी ना जाने क्या क्या...

कूल क्रो ने पहले तो चारो तरफ नज़रें घुमा कर सबको देखा फिर अचानक उसने कुछ ऐसा किया की वहाँ पर मौजूद सारे कौवे एकदम से चुप हो गए। चारो तरफ तूफ़ान के पहले सी खामोशी छा गयी। कूल क्रो ने अपने पंख उठाये और उनके नीचे से कुछ स्ट्रा, जो उसने फोल्ड करके रखे थे, उन्हें निकाला। उसने उसमे से तीन स्ट्राज़ को एक दूसरे के पीछे लगाया और एक लम्बा सा पाइप बना लिया। अगले ही पल वो घड़े के ऊपर बैठा पाइप के द्वारा आराम से पानी पी रहा था।

ये देखना था की चारो तरफ वाहवाही होने लगी। वओ कौवे जो अब तक उसके हांरने का जश्न मनाने को तैयार बैठे थे , तालियाँ बजा बजा कर उसका उत्साह बढाने लगे। कुछ जवान कौवे दौड़ कर आये और उन्होंने कूल क्रो को अपने कंधो पर उठा लिया । चारो तरफ लोग उत्साह और हर्ष के साथ कूल क्रो का यशगान करने लगे।

दूरी तरफ बाकी किलर क्रोज़, जो की ये सोच कर आ रहे थे वहाँ पहुचते ही कूल क्रो की बेईज्ज़ती करेंगे, ये देख कर सकते में आ गए की यहाँ तो पूरा मंज़र ही बदला हुआ है। वो बिना कुछ बोले ही चुप चाप वहाँ से खिसकने वाले थे की बाकी कौवों ने उन्हें देखा लिया और घेर कर मंदिर की छत पर ले आये।

सबसे बुज़ुर्ग कौवा बोला की हालाकि अभी तक तो ये दौड़ सिर्फ किलर क्रोज़ का लीडर चुनने की थी लेकिन कूल क्रो चतुराई और इनोवेटिव स्किल देख के हमने फैसला लिया की वो आजसे पूरी कौवा बिरादरी का लीडर होगा। ये ही नहीं बाकी किलर क्रोज़ को ये सजा दी जाती है की अगले एक साल तक उन्हें लूज़र क्रोज़ के नाम से पुकारा जाएगा और बिरादरी का कोई भी कौवा उनसे बात नहीं करेगा।

तो बच्चों इस कहानी से हमे ये शिक्षा मिलती है कि चाहे वक़्त बदल जाए इनोवेशन और आउट ऑफ़ द बॉक्स थिंकिंग कि हमेशा वेल्यू होती है । पहले अगर घड़े में कंकण डालना इनोवेशन था तो आज स्ट्रा से पानी पीना है और आने वाले कल में कुछ और होगा। इसलिए ये याद रखो कि अपने दिमाग को हमेशा कुछ नया सोचने के लिए पुश करते रहो।

2 comments:

Nikhil said...

cool... out of the box story :)

Anonymous said...

खुद्दार एवं देशभक्त लोगों का स्वागत है!
सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले हर व्यक्ति का स्वागत और सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है। इसलिये हम प्रत्येक सृजनात्कम कार्य करने वाले के प्रशंसक एवं समर्थक हैं, खोखले आदर्श कागजी या अन्तरजाल के घोडे दौडाने से न तो मंजिल मिलती हैं और न बदलाव लाया जा सकता है। बदलाव के लिये नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है।

अतः समाज सेवा या जागरूकता या किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को जानना बेहद जरूरी है कि इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम होता जा है। सरकार द्वारा जनता से टेक्स वूसला जाता है, देश का विकास एवं समाज का उत्थान करने के साथ-साथ जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों द्वारा इस देश को और देश के लोकतन्त्र को हर तरह से पंगु बना दिया है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, व्यवहार में लोक स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को भ्रष्टाचार के जरिये डकारना और जनता पर अत्याचार करना प्रशासन ने अपना कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं प्रत्येक बुद्धिजीवी, संवेदनशील, सृजनशील, खुद्दार, देशभक्त और देश तथा अपने एवं भावी पीढियों के वर्तमान व भविष्य के प्रति संजीदा व्यक्ति से पूछना चाहता हूँ कि केवल दिखावटी बातें करके और अच्छी-अच्छी बातें लिखकर क्या हम हमारे मकसद में कामयाब हो सकते हैं? हमें समझना होगा कि आज देश में तानाशाही, जासूसी, नक्सलवाद, लूट, आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका एक बडा कारण है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के भ्रष्ट अफसरों के हाथ देश की सत्ता का होना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-"भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास)- के सत्रह राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से मैं दूसरा सवाल आपके समक्ष यह भी प्रस्तुत कर रहा हूँ कि-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! क्या हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवक से लोक स्वामी बन बैठे अफसरों) को यों हीं सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस संगठन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :
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